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UN में भारत को वीटो दो, ब्रिक्स से पहले बोला यूरोपीय संघ

 ब्रिक्स सम्मेलन की ऐतिहासिक बैठक से ठीक पहले यूरोप के दिल से आई एक ऐसी कूटनीतिक मिसाइल दाग दी गई है जिसकी गूंज वाशिंगटन, लंदन, पेरिस से लेकर बीजिंग तक साफ सुनाई दे रही है। यह आवाज किसी और से नहीं बल्कि यूरोप के सबसे समृद्ध और कूटनीतिक रूप से जागरूक देश लग्जमबर्ग के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जेवियर बेटेल ने उठाई है। उन्होंने बिना लाग लपेट के सीधे-सीधे शब्दों में कह दिया कि अगर दुनिया में न्याय चाहिए, तो भारत को तुरंत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी कि यूएससी में स्थाई यानी कि परमानेंट सीट दे देनी चाहिए। भारत का आकार, भारत का समर्थ और भारत का वैश्विक कद अब किसी औपचारिक मुहर का मोहताज नहीं है। लग्जबर्ग के उप प्रधानमंत्री ने भारत के तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर बड़ा बयान दिया। इस दौरे पर वे नई दिल्ली में उच्च स्तरीय वार्ताओं के बाद आईआईटी मद्रास चेन्नई के कार्यक्रम में भी हिस्सा लेने पहुंचे। लेकिन उनकी यात्रा की सबसे बड़ी सुर्खी बनी उनका वह बेबाक इंटरव्यू जिसमें उन्होंने यूएससी की मौजूदा बनावट की धज्जियां उड़ा दी। 

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भारत की परमानेंट सीट को लेकर और कैसे इस दादागिरी को खत्म किया जो सिर्फ पांच देशों की जेबों में है। यह केवल एक कूटनीतिक तारीफ नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वर्तमान ढांचे यानी अभी मौजूदा ढांचे पर एक ऐसी नैतिक चाबू है, सीधा चाबुक है। बैटल ने सिर्फ भारत को परमानेंट सदस्यता का समर्थन ही नहीं किया बल्कि उस सबसे बड़ी बुराई पर हमला बोला जिसने यूएन को एक मूकदर्शक संस्था बना दिया। यानी वीटो पावर। लग्जमबर्ग के विदेश मंत्री ने एक बेहद व्याहारिक समाधान सामने रखा। 2/3 ओवर राइड यानी अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दो तिहाई देश किसी वैश्विक शांति या संकट के मुद्दे पर एक साथ हो तो किसी एक देश के वीटो को निरस्त कर देना चाहिए। ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्था का समूह नहीं रहा है। दोस्तों यह ग्लोबल साउथ की नई धड़कन बन चुका है और उसका प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है? भारत।
 

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ब्रिक्स लगातार एक बहुद्रवी विश्व व्यवस्था और यूएन संस्थाओं के लोकतांत्रीकरण की मांग कर रहा है। जब यूरोपीय संघ यानी इयू का संस्थापक सदस्य और पश्चिमी वित्तीय प्रणाली का केंद्र लग्जमबर्ग ब्रिक्स के मंच पर जाने से पहले भारत और ब्राजील की परमानेंट सीट की वकालत करता है तो यह संदेश साफ है कि पश्चिम दुनिया के भीतर भी अब यह स्वीकार्यता बन चुकी है कि भारत के बिना कोई भी वैश्विक व्यवस्था वैध नहीं हो सकती है। भारत ने भी हाल ही में यूएन के मंच से कड़ा संदेश दिया था और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई मिशन की चार्ल्स डी अफेयर्स राजदूत योजना पटेल ने दो टूक शब्दों में कहा था हमने भारत तक पर आपको दिखाया था कि 1945 की दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी है।

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