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बाढ़ व कटान ने बदली यूपी की सियासी सूरत, किसी का राज्य बदला तो किसी की पंचायत; हर साल तबाही लिख रही नई दास्तां

लवकुश सिंह, बलिया। गंगा और सरयू की कटान से उजड़ने-बसने का सिलसिला पिछले कई दशक से चल रहा है। हर साल नदियां तबाही की अलग दास्तां लिख जाती हैं। 35 लाख की आबादी वाले जनपद में हर साल किसी का घर नदी में चला जाता है तो कोई अपनी उपजाऊ भूमि गंवा देता है। नदियों में आशियाना समाने के बाद पूरे परिवार की जिंदगी सड़क पर आ जाती है। किसी की ग्राम पंचायत बदल जाती है तो किसी का राज्य तक बदल जाता है। बलिया जनपद सात विधान सभा क्षेत्र, तीन लोकसभा क्षेत्र में बंटा है। बलिया नगर, बैरिया और फेफना विधान सभा क्षेत्र बलिया लोकसभा क्षेत्र में है, जबकि बांसडीह, सिकंदरपुर और बेल्थरारोड सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र में शामिल है। रसड़ा विधानसभा क्षेत्र घोसी लोकसभा का हिस्सा है। सात लाख की आबादी हर साल बाढ़ और कटान से दो माह तक परेशान रहती है। पांच साल पहले कटान के चलते ही छपरा लोकसभा क्षेत्र के सिताबदियारा में स्थित गांव बड़का बैजू टोला की लगभग एक हजार की आबादी कटान से तबाह होकर बलिया लोकसभा क्षेत्र के बैरिया विधान सभा क्षेत्र में नरहरी धाम के पास आकर बस गई। पिछले विधान सभा चुनाव के दौरान सभी को जिले का मतदाता भी बनाया गया। अब सभी लोग बैरिया विधान सभा क्षेत्र के वोटर हैं। इस तरह से और भी कई गांव हैं, जिनका कटान के कारण भूगोल बदल गया है। वर्ष 2021-22 में 111 करोड़ से 19 परियोजनाओं पर कार्य हुआ था। 2022-23 में 65 करोड़ रुपये की लागत से 13 परियोजनाओं पर काम हुआ। इस साल भी 80 करोड़ की लागत से 13 स्थानों पर कटान के सुरक्षात्मक उपाय किए जाने हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान बलिया व सलेमपुर क्षेत्रों में बाढ़ व कटान मुद्दा बनता रहा है, लेकिन कटान का निदान नहीं हो सका। पिछले एक दशक में गंगा और सरयू की विनाशलीला पर नजर डालें तो वर्ष 2013 से अब तक ढाब क्षेत्र के विभिन्न गांवों में 904 लोगों का घर गंगा व सरयू में समाहित हो गया। अब तक 516 लोगों को जमीन का पट्टा मिला है पर उस जमीन पर पीड़ित कब्जा नहीं कर पा रहे हैं। जानिए, कितना हुआ नुकसान 2013: बेलहरी, मझौंवा, पचरुखिया, नारायणपुर, गंगापुर, केहरपुर आदि इलाके के 377 लोगों का आशियाना गंगा में समाहित हो गया। 2014: सरयू किनारे बसे इब्राहिमाबाद नौबरार में 152 लोगों का आशियाना नदी कटान में चला गया। 12 सितंबर 2017 को दूसरे ग्राम पंचायत चांददियर में सभी को पट्टा दिया गया पर स्थानीय लोगों ने इनके बसने को लेकर विरोध कर दिया। 2016: गंगा में बहुआरा गांव के 58 मकान नदी में समाहित हो गए। सभी को 2020 में पट्टा देकर बसाया गया। अब सभी लोग नया आशियाना तैयार कर चुके हैं। 2019: केहरपुर के 149, गोपालपुर के 103 मिलाकर कुल 252 लोगों के मकान गंगा में गिरे। अब भी सभी लोग दुबे छपरा में एनएच-31 के किनारे झोपड़ी डालकर गुजर बसर कर रहे हैं। 64.34 लाख में जमीन खरीद 65 को दिया पट्टा 2019 में ही गंगापुर के 65 लोगों के मकान गंगा में समाहित हो गए। 64.34 लाख से दूसरे ग्राम पंचायत दया छपरा में जमीन खरीद कर पट्टा दे दिया गया है। 2023: सरयू के कटान से गोपालनगर टांड़ी गांव के 50 लोगों के मकान नदी में समाहित हो गए। अभी सभी लोग अपने गांव में ही दूसरे स्थानों पर झोपड़ी डालकर रह रहे हैं। इसे भी पढ़ें: UP Politics: जमानत जब्त, फिर भी सांसद बन गए थे कांग्रेस प्रत्याशी; बेहद दिलचस्प रहा है यूपी की लोकसभा सीट का इतिहास

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