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आपराधिक मामले को अनुचित अवधि तक लंबा खींचना एक प्रकार की पीड़ा है : न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी आपराधिक मामले को अनुचित अवधि तक खींचना एक प्रकार की पीड़ा है, जो कार्यवाही का सामना कर रहे व्यक्ति के लिए मानसिक कारावास के समान है।

न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया और ए.एस. चंदुरकर ने यह टिप्पणी उस समय की, जब उन्होंने एक महिला को भ्रष्टाचार के मामले में सुनाई गई सजा को घटाकर केवल पहले से जेल में बिताई जा चुकी अवधि तक सीमित कर दिया।
उसकी दोषसिद्धि की पुष्टि करते हुए पीठ ने कहा कि यह घटना 22 वर्ष पहले घटित हुई थी और महिला अब 75 वर्ष की हो चुकी है।

अदालत ने हालांकि उन पर लगाए गए जुर्माने को मूल जुर्माने से 25,000 रुपये अधिक कर दिया।
पीठ ने 21 अगस्त को कहा, “किसी आपराधिक मामले को अनुचित अवधि तक खींचना अपने आप में एक प्रकार की पीड़ा है। ऐसी कार्यवाही का सामना करने वाले व्यक्ति के लिए यह मानसिक कारावास के समान है।”

उच्चतम न्यायालय का यह फैसला महिला द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय के अगस्त 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया, जिसमें अधीनस्थ अदालत के आदेश की पुष्टि की गई थी।

निचली अदालत ने केंद्रीय उत्पाद शुल्क निरीक्षक के रूप में कार्यरत महिला को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया और उसे एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई।
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि सितंबर 2002 में उसने 300 रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति दोषसिद्धि के खिलाफ अपील करता है और हर दिन मुकदमे के परिणाम का इंतजार करता है, वह अपना समय परेशानी में बिताता है।

पीठ ने कहा, “न्याय प्रशासन की वर्तमान प्रणाली में, जिसमें कार्यवाही अक्सर अनुचित रूप से लंबी और असहनीय हो जाती है, लंबा समय बीतने से व्यक्ति को मानसिक पीड़ा होती है।

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