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Supreme Court में 1 लाख पार होगा Case Load, CJI Surya Kant ने जजों व New Courtrooms की मांग पर दिया जोर

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने शनिवार को ज़िला अदालतों में न्यायिक बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने और और ज़्यादा न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, ताकि समय पर न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि अदालतों पर बढ़ते मामलों का दबाव है और इसके लिए और ज़्यादा कोर्टरूम, तेज़ी से भर्ती और बेहतर सुविधाओं की ज़रूरत है। ज़िला अदालत परिसर में मल्टी-लेवल पार्किंग सुविधा का उद्घाटन करने के बाद बोलते हुए, कांत ने पंजाब और हरियाणा सरकारों से सब-डिविज़नल और ज़िला अदालतों में बुनियादी ढांचे को अपडेट और विकसित करने के लिए ज़रूरी फ़ैसले लेने का आग्रह किया। इस कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया और सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस शील नागू मौजूद थे। कांत ने कहा कि पंजाब और हरियाणा में सब-डिविजनल लेवल पर बार की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, जिसका मतलब है कि ज्यूडिशियल अधिकारियों की मांग भी बढ़ रही है। उन्होंने पूछा, आपने देखा होगा कि हर साल भर्ती करने के बावजूद, हम सभी पद नहीं भर पाते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि अगर हम ज्यूडिशियल अधिकारियों को नियुक्त करते हैं, तो क्या उनके लिए ज्यूडिशियल इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है? अगर कोर्टरूम ही नहीं होंगे, तो ज्यूडिशियल अधिकारी की नियुक्ति का क्या फायदा?

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उन्होंने हाल के वर्षों में नए मामलों में हुई भारी बढ़ोतरी की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि मैं आपको सुप्रीम कोर्ट का उदाहरण देता हूं। 2024 में वहां लगभग 75,000 मामले दर्ज किए गए थे। 2025 में यह संख्या बढ़कर लगभग 80,000-83,000 हो गई। इस साल, हमें लगता है कि यह संख्या एक लाख को पार कर जाएगी। इसे ध्यान में रखते हुए, मैंने केंद्र सरकार से अनुरोध किया, जिसने इसे (सुप्रीम कोर्ट के जजों की स्वीकृत संख्या) 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया। सीजेआई ने कहा कि देश में केसों के पेंडिंग होने को लेकर एक धारणा बनी हुई है, लेकिन इस मुद्दे को सही ढंग से समझने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि वह इस दावे को नहीं मानते कि पेंडिंग केसों की संख्या एक करोड़ है। उनके मुताबिक, जैसे ही कोई केस फ़ाइल होता है, उसे गिनती में शामिल कर लिया जाता है, लेकिन प्रक्रियात्मक ज़रूरतों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने की वजह से उसका फ़ैसला उसी दिन नहीं किया जा सकता।

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उन्होंने कहा कि फ़ैसला सुनाने से पहले नोटिस जारी करने, दलीलें पूरी करने, सिविल मुकदमों में मुद्दे तय करने और दोनों पक्षों को सबूत पेश करने का मौका देने जैसी प्रक्रियाएँ पूरी करनी होती हैं। उन्होंने कहा कि जहाँ तक प्रक्रियात्मक ज़रूरतों की बात है, मैं उस केस को बकाया (arrears) नहीं मानता। केस पेंडिंग हो सकता है, लेकिन इसके पीछे एक वाजिब वजह होती है क्योंकि उस मामले में कानून में बताई गई प्रक्रिया का पालन किया जा रहा होता है।

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