(कुशान सरकार)
नयी दिल्ली, 30 जुलाई यह पांच साल पहले की बात है जब अजिंक्य रहाणे ऑस्ट्रेलिया में कई स्टार खिलाड़ियों की अनुपस्थिति के कारण कमजोर पड़ी भारतीय टीम को टेस्ट श्रृंखला में अप्रत्याशित टेस्ट जीत दिलाने के बाद मुंबई में अपनी आवासीय सोसायटी में लौटे, तो उनके पड़ोसियों ने कंगारू के आकार के टॉपिंग वाले केक से उनका स्वागत किया। रहाणे ने उसे एक नज़र देखा और केक के ऊपर से टॉपिंग हटाने के बाद ही उसे काटने के लिए राजी हुए। कंगारू ऑस्ट्रेलियाई गौरव का प्रतीक है और अपनी जीत के बावजूद वह प्रतिद्वंद्वी टीम के राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान नहीं करना चाहते थे।
इस घटना से उस व्यक्ति के चरित्र का पता चलता है जिन्होंने शांत रहकर पूरी ईमानदारी और साहस के साथ अपना काम किया। 38 वर्ष के रहाणे ने 85 टेस्ट मैचों में 12 शतकों सहित 5000 से अधिक रन बनाए। उन्होंने भारत की तरफ से अपना अंतिम मैच दो साल पहले खेला था और अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने का फैसला किया।
इससे हालांकि एक सवाल अब भी जवाब की तलाश में है कि क्या रहाणे अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी थे या भारतीय क्रिकेट ने उन्हें कम आंका? अपने करियर में अधिकतर समय रहाणे भारतीय क्रिकेट के दो दिग्गज खिलाड़ियों विराट कोहली और रोहित शर्मा के साए में खेलते रहे जिससे भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान पर ज्यादा चर्चा नहीं हो पाई। इसके बावजूद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में नियमित कप्तान कोहली की अनुपस्थिति और कुछ खिलाड़ियों के चोटिल हो जाने के बाद साबित किया कि वह एक कुशल और प्रेरणादायी कप्तान हैं।
उन्होंने तब न सिर्फ कप्तान बल्कि एक बल्लेबाज के रूप में भी अच्छा प्रदर्शन करके भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। लेकिन सभी शांत स्वभाव वाले खिलाड़ियों की तरह रहाणे ने कभी कोई शिकायत नहीं की जबकि उन्हें लंबे समय तक कप्तान नहीं रखा गया था। उन्होंने संकट के समय बखूबी टीम की कमान संभाली और दिखाया कि वह ड्रेसिंग रूम को शांत बनाए रखकर अपने काम को अंजाम देने में माहिर हैं।
उन्होंने कैमरे के सामने कभी दिखावटी भावनाएं नहीं दिखाई। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ श्रृंखला जीतने के बाद उनके चेहरे पर संतुष्ट स्पष्ट नजर आ रही थी। इसके बाद नियमित कप्तान की वापसी पर वह बिना किसी शिकायत के अपनी दूसरी भूमिका निभाते रहे।
शिकायत करना उनके स्वभाव में नहीं था। जब वे आठ साल के थे, तब उनके पिता मधुकर ने उन्हें उपनगरीय डोम्बिवली से अकेले मुंबई मैदान जाने को कहा, तब भी उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने घरेलू क्रिकेट में कड़ी मेहनत से अपनी पहचान बनाई और सीमित अवसरों में भी भारत का शानदार नेतृत्व किया।
अपने नाम के अनुरूप वह उन सभी छह टेस्ट मैचों में अजेय रहे जिनमें उन्होंने कप्तानी की थी। लॉर्ड्स की घास वाली पिच पर पहले दिन बनाया गया शतक एक ऐसी पारी थी जिसने उनके धैर्य और तकनीक दोनों को समान रूप से प्रदर्शित किया। लेकिन वाहवाही इशांत शर्मा को मिली जिन्होंने आखिरी दिन सात विकेट लिए थे।
रहाणे पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह संतुष्ट थे कि उन्होंने अपने काम को अच्छी तरह से निभाया। 2021 में मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी।
एडिलेड में 36 रन पर ऑल आउट होने की शर्मनाक हार के बाद, मेलबर्न में रहाणे के शतक ने सीरीज बराबर करने वाली जीत की नींव रखी। उनकी कप्तानी रणनीति के लिहाज से बेहतरीन थी। यह अभिव्यक्ति में सरल और क्रियान्वयन में उत्कृष्ट थी।
मोहम्मद सिराज, शार्दुल ठाकुर, टी नटराजन और वाशिंगटन सुंदर जैसे गेंदबाजों का शानदार उपयोग करके उन्होंने भारत को श्रृंखला में जीत दिलाई थी। यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी लेकिन उन्होंने ऋषभ पंत को भारत का ध्वज लेकर विजय जुलूस का नेतृत्व करने के लिए कहा और स्वयं दूसरी पंक्ति में चले गए। मेलबर्न में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वनडे विश्व कप में भी उन्होंने एक शानदार पारी खेली थी, लेकिन वह जल्द ही लोगों की यादों से धुंधली पड़ गई।
उस पारी के डेढ़ साल के भीतर ही उन्हें वनडे टीम से बाहर कर दिया गया। स्पिनरों का सामना करने में रहाणे को दिक्कतें आती थीं, जो उनकी कमजोरी बन गई और अंततः उनके टीम से बाहर होने का कारण बनी। लेकिन रहाणे मैदान पर हों या मैदान के बाहर, हर जगह अपनी शालीनता का परिचय देते थे।
इसका एक उदाहरण यह है जब एक घरेलू मैच के दौरान विपक्षी बल्लेबाज को अपशब्द कहने पर उन्होंने यशस्वी जायसवाल को मैदान से ‘बाहर निकल जाने’ का आदेश दे दिया था। उन्होंने अंपायर का इंतजार नहीं किया। सीधे जायसवाल को मैदान छोड़ने को कह दिया।
वह भारतीय टीम से अंदर बाहर होते रहे लेकिन उन्होंने कभी अपना जज्बा नहीं खोया। उन्होंने विश्व टेस्ट चैम्पियनशिप के फाइनल में वापसी की, जहां वह ओवल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शतक बनाने से चूक गए, लेकिन वेस्टइंडीज में कुछ असफलताओं ने उनके अंतरराष्ट्रीय करियर को समाप्त कर दिया।
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