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बेटे की मौत के बाद बहू से गुजारा भत्ता मांग सकते हैं सास-ससुर? Allahabad HC ने कहा- नहीं!

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी जिम्मेदारी के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक बुजुर्ग दंपति की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू से गुजारा भत्ता दिलाने की मांग की थी।

क्या है पूरा मामला?

एक बुजुर्ग दंपति, जिनका बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल था, उसकी 2021 में मृत्यु हो गई थी। बुजुर्गों का कहना था कि वे अनपढ़ हैं और पूरी तरह अपने बेटे पर निर्भर थे। बेटे की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी (बहू), जो खुद भी यूपी पुलिस में कांस्टेबल है, उसे नौकरी से जुड़े सभी वित्तीय लाभ मिले। बुजुर्गों ने दलील दी कि पर्याप्त आय होने के कारण बहू का यह कर्तव्य है कि वह अपने सास-ससुर का ख्याल रखे।
 

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‘नैतिक’ और ‘कानूनी’ दायित्व के बीच अंतर

जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने 4 फरवरी को दिए अपने फैसले में कहा कि समाज में बहू का अपने सास-ससुर की सेवा करना एक नैतिक जिम्मेदारी मानी जा सकती है, लेकिन कानून में इसका कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कानून में लिखित आदेश न हो, तब तक किसी भी नैतिक भावना को कानूनी रूप से थोपा नहीं जा सकता।

धारा 144 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) का दायरा

बुजुर्ग दंपति ने ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ की धारा 144 के तहत राहत मांगी थी। कोर्ट ने इस पर गौर करते हुए कहा, ‘यह धारा केवल पत्नी, बच्चों और माता-पिता को गुजारा भत्ता दिलाने का अधिकार देती है। कानून बनाने वालों ने सोच-समझकर ‘सास-ससुर’ को इस सूची से बाहर रखा है। इसलिए, इस कानून के तहत बहू को सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए आदेश नहीं दिया जा सकता।’
 

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कोर्ट का अंतिम फैसला

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को सही ठहराते हुए बुजुर्गों की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि बहू को नौकरी ‘अनुकंपा’ (बेटे की जगह) के आधार पर मिली थी। कोर्ट ने अंत में दोहराया कि गुजारा भत्ता केवल वही लोग मांग सकते हैं जो कानून द्वारा निर्धारित विशेष श्रेणियों में आते हैं।

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