आज के दौर में जब भी हमसे कहीं पहचान मांगी जाती है, हम तुरंत जेब से आधार कार्ड निकाल देते हैं या विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट सामने रख देते हैं। लेकिन क्या कानूनन ये दस्तावेज आपकी भारतीय नागरिकता को पुख्ता करते हैं? इस गंभीर और पेचीदा सवाल पर वरिष्ठ अधिवक्ता और कानूनी विशेषज्ञ विराग गुप्ता ने एक ऐसा व्यावहारिक तर्क दिया है, जिसने देश के प्रशासनिक और राजनीतिक विमर्श को एक नया मोड़ दे दिया है। अपने विशेष कार्यक्रम ‘नो फिल्टर विथ विराग गुप्ता’ में उन्होंने जाने-माने अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल के एक पुराने बयान का हवाला देते हुए व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े किए हैं।
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1 लाख में 1 अपराधी, तो सबको कानूनी संकट क्यों?
चर्चा के दौरान विराग गुप्ता ने संजीव सान्याल की बात को दोहराते हुए कहा कि यदि एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति अपराध करता है, तो सिर्फ उस एक अपराधी को पकड़ने के लिए हम बाकी के 99,999 निर्दोष लोगों को कानूनी संकट में नहीं डाल सकते। यही सिद्धांत हमारे नागरिकता के दस्तावेजों और पासपोर्ट पर भी लागू होना चाहिए। देश में अगर कुछ सौ या हजार लोगों ने फर्जी तरीके से पासपोर्ट या वोटर आईडी बनवा ली है, तो सरकार को उन अपराधियों पर टारगेटेड स्ट्राइक करनी चाहिए। न कि उन विसंगतियों का हौवा खड़ा करके देश के करोड़ों वैध पासपोर्ट धारकों और नागरिकों को बार-बार अपनी पहचान साबित करने के चक्रव्यूह में फंसाना चाहिए।
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख का सवाल
विराग गुप्ता ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि भारत का पासपोर्ट विदेशों में हमारी नागरिकता का अकाट्य प्रमाण माना जाता है, लेकिन देश के भीतर ही कुछ कानूनी कुतर्कों के आधार पर इसे ‘सिर्फ एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट’ कहकर इसकी क्रेडिबिलिटी को संदिग्ध बना दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय पासपोर्ट रैंकिंग में भारत पहले से ही काफी पीछे है। ऐसे में अगर हम खुद अपने ही सरकारी दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर बार-बार राजनीतिक या प्रशासनिक सवाल उठाएंगे, तो इससे विदेशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों और पर्यटकों की साख खराब होती है और इमीग्रेशन जैसी जगहों पर उन्हें संदेह की नजर से देखा जा सकता है।