संगीत प्रेमियों के दिलों को जीने वाले गजल सम्राट जगजीत सिंह का आज 84 वां जन्मदिन है। उन्होंने यूं तो अपने करियर में कई गजलों को अपनी आवाज से और भी खूबसूरत बना दिया था, लेकिन उन्होंने फिल्मी गानों से भी खूब नाम कमाया। जगजीत सिंह आज हमारे बीच बेशक नहीं हैं, लेकिन संगीत की दुनिया में उनकी आवाज अमर है। उन्होंने कई बड़े पुरस्कार भी जीते। साल 1998 में ‘मिर्जा गालिब’ में उनके शानदार काम के लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा गया।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को हुआ था। उनका असली नाम जगमोहन सिंह धीमान था। जगजीत का परिवार मूल रूप से पंजाब के रोपड़ जिले से था। उनकी शुरुआती पढ़ाई गंगानगर में हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वह जालंधर चले गए। जगजीत सिंह के पिता सरदार अमर सिंह धमानी सरकारी कर्मचारी थे और संगीत में रुचि रखते थे। जगजीत को संगीत उनके पिता से ही विरासत में मिला। साल 1965 में वह मुंबई आ गए, जहां उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। पेट पालने के लिए उन्होंने छोटी-छोटी संगीत सभा और कार्यक्रमों में गाने गाए।
जगजीत सिंह फिल्मों में ब्रेक पाने की उम्मीद में फिल्मी पार्टियों में भी गाने गाते थे। उन्होंने 1970 और 1980 के दशक में अपनी पत्नी चित्रा सिंह के साथ एक से एक बेहतरीन गजलें गाईं और देश-विदेश में अपनी आवाज का जादू बिखेर दिया। चित्रा सिंह और जगजीत सिंह की मुलाकात एक रेडियो एड की रिकॉर्डिंग के दौरान हुई थी। वहीं से दोनों ने अपने प्यार के सफर की शुरुआत की और जिंदगी भर साथ चलने की ठानी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कम ही लोग जानते हैं कि चित्रा ने जगजीत सिंह से दूसरी शादी की थी। उनकी पहली शादी देबू प्रसाद दत्ता से हुई थी, जिनसे उन्हें बेटी मोना भी है।
गजल सम्राट जगजीत ने अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत 1994 में फिल्म ‘अविष्कार’ के गाने ‘बाबुल मोरा नैहर’ से की थी। वहीं, उनकी पहली एलबम ‘द अनफॉरगेटेबल्स’ साल 1976 में आई थी, जो काफी हिट साबित हुई। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने जब फिल्मों के लिए गजल गानी शुरू की तो देखते-देखते वह हर किसी की पहली पसंद बन गए। साल 1990 में जब जगजीत सिंह अपने करियर के चरम पर थे, तब उन्हें अपनी जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजरना पड़ा।
उस साल कार दुर्घटना में उन्होंने 18 साल के इकलौते बेटे विवेक को खो दिया था। उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने इस हादसे के बाद प्रोफेशनल सिंगिंग ही छोड़ दी, जबकि जगजीत को भी अपने पहले प्यार संगीत की दुनिया में वापस आने में कई साल लग गए थे। बेटे के अचानक चले जाने के गम ने पिता को भी कई महीनों तक खामोश कर दिया। करीब छह महीने बाद सीने में इस सदमे को दबाए जब जगजीत सिंह वापस गजल गायकी की दुनिया में लौटे तो उनकी आवाज में किसी को खोने का दर्द कई गुना बढ़ा हुआ नजर आया। 10 अक्तूबर 2011 को जगजीत का निधन हो गया।
बता दें कि ‘झुकी-झुकी सी नजर बेकरार है कि नहीं’, ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो’, ‘तुमको देखा तो ये ख्याल आया’, ‘प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है’, ‘होश वालों को’, ‘होठों से छू लो तुम’, ‘ये दौलत भी ले लो’, ‘चिठ्ठी न कोई संदेश’ जगजीत सिंह की खास गजलें में से एक हैं। जगजीत सिंह के 150 से ज्यादा एल्बम को अपनी गजलों से खूबसूरत बनाया था। जगजीत सिंह आज हमारे बीच बेशक नहीं हैं, लेकिन संगीत की दुनिया में उनकी आवाज अमर है। उन्होंने कई बड़े पुरस्कार भी जीते। साल 1998 में ‘मिर्जा गालिब’ में उनके शानदार काम के लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा गया। 2003 में उन्हें पद्म भूषण सम्मान मिला था।