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वक्फ इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं, सिर्फ दान है, सुप्रीम कोर्ट में सरकार की दलील

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वक्फ एक इस्लामी अवधारणा है, लेकिन यह धर्म का अनिवार्य या अनिवार्य हिस्सा नहीं है। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने वक्फ कानूनों की वैधता और कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चल रही सुनवाई के दौरान यह दलील दी। मेहता ने पीठ से कहा कि वक्फ एक इस्लामी अवधारणा है, लेकिन इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि दान सभी धर्मों की विशेषता है। यहां तक ​​कि ईसाई भी इसका पालन कर सकते हैं। हिंदू धर्म में दान की एक संरचित प्रणाली है। सिख समुदाय भी इसी तरह की प्रथाओं का पालन करता है। 

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अगर वक्फ 100 साल पुराना है तो रिकॉर्ड क्यों नहीं दिखाए?
वक्फ संस्थाओं के एक सदी से भी पुराने होने के दावों का खंडन करते हुए मेहता ने कहा, “हमें 100 साल पहले की संपत्ति के दस्तावेज कहां मिलेंगे? यह गलत तरीके से पेश किया जा रहा है कि इस तरह के दस्तावेज कभी जरूरी नहीं थे। अगर आप 100 साल से पहले के वक्फ स्टेटस का दावा करते हैं, तो कम से कम पिछले पांच साल के रिकॉर्ड तो पेश करें। उन्होंने कहा कि दस्तावेज हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं और कानून के तहत प्रक्रिया की पवित्रता से जुड़े रहे हैं। मेहता ने कहा कि 1923 के अधिनियम में कहा गया है कि अगर दस्तावेज मौजूद हैं, तो उन्हें प्रस्तुत किया जाना चाहिए। अन्यथा, उत्पत्ति के बारे में जो भी जानकारी है, उसे प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 

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वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी का बचाव करते हुए मेहता ने कहा कि उनके शामिल होने से धार्मिक गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि अगर दो गैर-मुस्लिम सदस्य हैं तो इससे क्या फर्क पड़ता है? वे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड की भूमिका प्रशासनिक है। उन्होंने बताया, वक्फ बोर्ड धर्मनिरपेक्ष कार्य करता है। जैसे संपत्तियों का प्रबंधन और खातों को बनाए रखना, जो ऑडिट के अधीन भी हैं।

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