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हाल ही में मध्य प्रदेश में पुलिस प्रशिक्षण के दौरान रामचरितमानस के पाठ को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि भारत में जब भी हिंदू धर्मग्रंथों से शिक्षा लेने की बात आती है, तो उसे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर क्यों विरोध का सामना करना पड़ता है? देखा जाये तो भारत का औपनिवेशिक और विभाजन का इतिहास धार्मिक आधार पर गहरे घाव छोड़ गया है। इसलिए जब किसी सरकारी संस्था में किसी विशेष धर्म के ग्रंथ को पढ़ने का आदेश दिया जाता है, तो अन्य समुदायों में यह भय फैलाया जाता है कि राज्य किसी विशेष धार्मिक पहचान को बढ़ावा दे रहा है।
ज्यादातर यही देखने में आता है कि विरोध करने वाले नेता या समूह यह सवाल उठाते हैं कि क्यों केवल हिंदू धर्मग्रंथों को चुना जाता है, जबकि अन्य धर्मों के ग्रंथों से भी नैतिक शिक्षा ली जा सकती है। दरअसल ऐसा कहने वालों को यह डर रहता है कि यदि वे हिंदू धर्मग्रंथों का समर्थन करेंगे, तो उन्हें “हिंदू-झुकाव” वाला दल कहा जाएगा, जिससे अल्पसंख्यक वोटरों का समर्थन कम हो सकता है। यही कारण है कि वे अत्यधिक सेकुलर दिखने के प्रयास में हिंदू धर्म से जुड़ी बातों पर विरोध जताने लगते हैं।
कुछ नेता यह भी मानते हैं कि हिंदू धर्मग्रंथों का समर्थन करने से वे “सांप्रदायिक” कहलाएँगे। इसलिए वह जानबूझकर विरोध करते हैं ताकि खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित कर सकें। इसके अलावा, चुनावी राजनीति में अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने के लिए हिंदू धर्म से जुड़े मुद्दों पर नकारात्मक रुख अपनाना ऐसे नेताओं के लिए एक रणनीति बन जाती है। देखा जाये तो धार्मिक ग्रंथों को “धर्म” नहीं बल्कि “सांस्कृतिक व नैतिक मूल्यों” के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। रामचरितमानस या गीता में जो कर्तव्यनिष्ठा, त्याग और सत्य की शिक्षा दी गई है, वह सभी धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से प्रेरक हो सकती है। बहरहाल, हिंदू धर्म ग्रंथों का विरोध करने वालों को समझना होगा कि भारत की धर्मनिरपेक्षता का मतलब किसी धर्म को दबाना या नकारना नहीं है, बल्कि सभी धर्मों को समान सम्मान देना है।
